पूरा सफ़र तेरे संग
कश्ती सा मैं था, भटका समन्दर में।
चुन कर मुझे, तूने राह दी तेरे शरण की।
तेरे परिवार में स्नेह से मुझे शांति मिली।
तू दे आशीष और दे वचन न्याय के।
फिर भी हूँ असमर्थ तेरी दया संजोने में।
अक्सर किया है विद्रोह, दुखाया तेरा दिल।
अनदेखा कर मेरे पापों को मुझे मोक्ष की ओर बढ़ाता।
जाऊँ मै दूर तो ख़तरों से खींच लाता।
करूँ विद्रोह, तो तू छुपे, तम मुझे जकड़ ले।
मैं वापस आऊँ, तू करुणा दे मुझे, हँस के पकड़ ले।
जब शैतान मारे मुझे, तू भर दे ज़ख़्म दिल के मेरे।