रविवार, 10 मार्च 2019

कलिसियाओं के लिए पवित्र आत्मा के वचन "संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन-सातवाँ कथन"


कलिसियाओं के लिए पवित्र आत्मा के वचन "संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन-सातवाँ कथन"

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "मेरे लोगो, जब तुम लोग मेरे वचनों को सुनते हो, तो क्या तुम लोग मेरी इच्छा को समझते हो? क्या तुम लोग मेरे हृदय को देखते हो? अतीत में, जब तुम लोग सेवा के पथ पर यात्रा कर रहे थे, तो तुम लोग उतार-चढ़ाव से होकर गुज़रे थे, तुम लोगों ने प्रगतियों और असफलताओं का सामना किया था, और ऐसे समय भी आए थे जब तुम लोग नीचे गिरने के ख़तरे में थे और यहाँ तक कि मुझसे विश्वासघात करने वाले थे; लेकिन क्या तुम लोग जानते थे कि हर घड़ी मैं हमेशा तुम लोगों को बचाने के कार्य में लगा हुआ था?
यह कि तुम लोगों को बुलाने और बचाने के लिए हर पल मैं हमेशा आवाज़ लगा रहा था? तुम लोग कितनी बार शैतान के फन्दों में गिरे हो? कितनी बार तुम लोग मनुष्यों के प्रलोभनों में उलझे हो? और फिर, तुम लोग कितनी बार, अपने आप को त्यागने में असफल होते हुए, एक दूसरे के साथ कभी न खत्म होने वाले झगड़े में पतित हुए हो? कितनी बार तुम लोगों के शरीर मेरे घर में रहे हैं परन्तु तुम लोगों के हृदय कहाँ थे कौन जानता है? तथापि, कितनी बार तुम लोगों को सँभालने के लिए मैंने अपना बचाने वाला हाथ फैलाया है; कितनी बार मैंने दया के कण तुम लोगों के बीच फेंके हैं; कितनी बार मैं तुम लोगों के दुःख की दयनीय दशा को देखना सहन करने में असमर्थ रहा हूँ? कितनी बार ... क्या तुम लोग नहीं जानते हो?"

Almighty God says, "My people, when you listen to My words, do you understand My will? Do you see My heart? In the past, as you traveled the path of service, you met with ups and downs, advances and setbacks, and there were times when you were in danger of falling down and even of betraying Me; but did you know that at every moment I was ever in the act of saving you? That at every moment I was ever uttering My voice to call and save you? How many times have you fallen into Satan’s nets? How many times have you been entangled in the snares of men? And again, how often have you, failing to let go of yourselves, lapsed into endless contention with one another? How often have your bodies been in My house but your hearts were who knows where? Nevertheless, how many times have I reached out My saving hand to hold you up; how many times have I cast among you the grains of mercy; how many times have I been unable to bear seeing the pitiful state of your suffering? How many times … do you know?"

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